मंगलवार, 17 जुलाई 2012

पड़ाव

जाने कहाँ से ,
इन्सान इस दुनिया में
आता  है,
अपनी असलियत से बेखबर,
यहीं का होके रह जाता है,
तिनका-तिनका जोड़ कर
घर बनाता है,
राह में पड़ने वाले,
 पडावो की ही अपनी मंजिल समझता है,
और अपनी असली मंजिल
को भूल जाता है,
 हँसता है, रोता है,
जगता है, सोता है,
और इसी तरह से दिन गुजारता है,
और जब एक दिन,
 पड़ाव उठने का समय आता  है,
तो अपना सब कुछ यहीं छोड़ कर ,
वो अपनी मंजिल की तरफ चला जाता है।

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर और गहन अभिव्यक्ति है आपकी.
    आभार.

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  2. Badi saralta se aap ne jivan ki vyatha-katha ko vyakt kiya hai, sundar aur gambhir prastutiऔर अपनी असली मंजिल
    को भूल जाता है,
    हँसता है, रोता है,
    जगता है, सोता है,
    और इसी तरह से दिन गुजारता है,
    और जब एक दिन,
    पड़ाव उठने का समय आता है,
    तो अपना सब कुछ यहीं छोड़ कर ,
    वो अपनी मंजिल की तरफ चला जाता है।

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  3. राह में पड़ने वाले,
    पडावो की ही अपनी मंजिल समझता है,
    और अपनी असली मंजिल
    को भूल जाता है,

    एकदम सही है ...जीवन में यही है मनुष्य की कमजोरी ....!

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