रविवार, 17 जून 2012


माँ,
 मैं  आज रात फिर नही सोयी,
 तुम्हारी चिंता में,
क्योंकि मैं  जानती हूँ कि ,
 तुम भी नहीं सोयी होगी वहां,
और सोती भी कैसे?,
फिर सताया होगा तुम्हे रात भर,
तुम्हारी उस पुरानी  बीमारी ने ,
 दर्द से कराहती रही होगी रात भर तुम ,
 बंधी हुयी हूँ मैं  परिस्थितियों में यहाँ,
चाह कर भी  आ नहीं सकती तुम्हारे पास वहाँ ,
घबराती हूँ,
तड़पती हूँ,
रह रह कर,
चीख चीख कर कहता है मेरा मन,
जा पुकार रही होगी तुझे तेरी माँ ,
वही माँ जो तेरे जरा से दर्द से घबरा जाती थी,
तुझे कंधे से लगाये पूरी रात बिताती थी,
सहलाती थी तेरी एक नन्ही सी चोट को भी,
तेरे एक आँसू से भी परेशां हो जाती थी,
और आज वो परेशां है,
कह नहीं सकती किसी से अपनी व्यथा ,
तकती रहती हैं उसकी आँखें तेरा रस्ता,
छोड़  दे ये वयस्तता ,
कुछ पल बिता माँ के साथ जा।













4 टिप्‍पणियां:

  1. Jindagi ki vyastata kaise ek duri bana deti hai...maa se bhi... par imandaar dil byan kar raha hai apni majburi ko... behtareeen:)

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  2. माँ बेटी दोनों स्त्री, दोनों का अपना अपना दर्द, अपनी अपनी परिस्थितियों से आहत एक दूसरे की फिक्र... ये रिश्ता ऐसा हीं है. बहुत मार्मिक रचना, शुभकामनाएँ.

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